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Sunday, April 25, 2010

शायरी - " लैला तो मिली, मग़र मै मजनु बन न सका |"


"ये शायरी उन लोगो के नाम जो किसी के प्यार में डुबे हुवे है , ये प्यार भी अजीब है .. न जाने कितने रंग है इसके ...कभी कोई प्यार में हँसता है, तो कभी कोई रोता है ..दिल की सुननेवाले अक्सर क्यों रोते है ? "



"कहते है दर्द और जुदाई का दूसरा नाम याने "प्यार" ..."महोब्बत" है ..लाख कठनाइयां हो ने के बावजूद भी प्यार का दर्द क्यों मीठा होता है यारो ?..प्यार करनेवाला हर कोई "लैला मजनू" बन नहीं सकता ..कभी कभी ऐसा भी होता है "लैला तो बन जाती है ...मगर मजनू नहीं बन सकता "


" लैला तो मिली, मगर मै मजनु बन ना सका ,


वो मेरे प्यार में " फ़ना "हो गई ,


मगर मै ,


उसके प्यार में "मिट" भी न सका ,


लैला तो मिली ,मगर मै मजनु बन ना सका "

11 comments:

  1. वो मेरे प्यार में फ़ना हो गयी पर मैं उसके प्यार में मिट न सका... बहुत खूब.... मिट कर देखते तो मोहब्बत का मजा आता....

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  2. sahi kaha Lokendra ji ne...

    http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

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  3. अच्छा प्रयास है मित्र जारी रखिये

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  4. ये क्या कह रहे है
    मजनू बनना चाहते है
    अरे जमाने की ठोकरे मिलेगी
    क्यों पत्थर खाना चाहते हैं

    बहुत सुन्दर

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  5. Kya baat hai .. par dil mein pyaar ho to aisa ho sakta hai ..

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  6. वाह क्या बात है! बहुत खूब! बढ़िया प्रस्तुती!

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  7. प्रयास करो हो जाओगे ।
    अग्रिम समर्पण ।

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  8. bilkul hi sahi kaha aapne....
    achha laga mujhe padhna....
    yun hi likhte rahein.......

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  9. लेकिन आपको ये सब लिखने की ज़रूरत क्यों पड़ गई..

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  10. sab se hat kar yah rachana thi aap ki

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  11. ओ भी क्या पल थे जब लोग हम्है किस कीया करते थे अपसोस तो इस बात का है तब हम दो साल के थे

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आओ रायता फैलाते है

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