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Tuesday, April 20, 2010

"ख़त ,कफ़न, कासिद ..और तेरा इंतज़ार |"





" तेरे ख़त का इंतज़ार करते करते ,



बीत गया हर लम्हा ,



तेरा "ख़त" आया , कम्बक्त "कासिद" आया ,



ये " कफ़न" जाने कहाँ से आया ,



आज भी ओढ़े सोया हु " कफ़न" ,



ख़त के इंतज़ार में |"

10 comments:

  1. waah ji waah behatrin dil ko choo gayee aapki ye rachna kuchh beete jamane ka yaad aa gaya

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  2. कफन के साये मे इंतजार क्या कहने

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  3. चंद लाइनों में गहरी बात ... कविता लाजवाब हैं .

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  4. बहुत ही गहरे भाव के साथ आपने बड़े ही सुन्दरता से प्रस्तुत किया है! हर एक शब्द दिल को छू गयी! उम्दा रचना!

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