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Sunday, January 16, 2011

मरीज की जान कीमती है ,या पैसा ?

                   
                      " आओ,मदद करे ग्रामीण विस्तार के गरीबों की अरे,सच्चा सुकून तो इसी में ही है |" विश्वास ग्रुप " अपने इस मंत्र को १४-०१-११ को कर रहा है साकार| ग्रामीण विस्तार में लोगों को बहुत सारी बातोँ में कठिनाई का सामना करना पड़ता है..जैसे कई ऐसे छोटे छोटे गाँव है जहाँ पर अस्पताल नहीं है  ..तो कोई जगह अस्पताल है मग़र अच्छे डॉक्टर नहीं है क्यों की वजह है छोटा गाँव और ऐसे में गाँव के लोगों को जरूरत पड़ती है सहर के किसी अच्छे अस्पताल की और बुलानी पड़ती है सरकारी १०८ अम्बुलंस मग़र ये १०८ भी शहर से ही आती है तो ऐसे में उसे भी थोडा वक़्त ही लगता है आने में और तब तक होता है मरीज का बुरा हाल ...ये परेशानी हर एक गाँव की है |"
             
                    " विश्वास ग्रुप के सदस्यों ने गाँव की इस परेशानी को समजा और गाँव वालों की मदद करने की ठान ली और निश्चय किया की ऐसे छोटे गाँव की वो मदद करेंगे ..ये बात हो रही है उस छोटे गाँव की जहाँ"महाशिवरात्रि" का इस देश का सबसे बड़ा मेला लगता है वो "जूनागढ़" के पास में बसा "भेसान" गाँव,..विश्वास ग्रुप के एक छोटे मग़र अहेम कदम ने गाँव वालों के चहेरे पे ख़ुशी की लहर ला दी, इस ख़ुशी की वजह थी २ ब्रांड न्यू a /c अम्बुलंस वो भी संतों के हाथों |"

                      * मरीज के दर्द पर मरहम जैसा काम |

                               " कहते है की किसी मरीज की सेवा करने में ही भगवान खुश है और इस बात का सबूत उन्हें तब मिला जब दो महान संत इस बात पर अति प्रशन्न हुवे ,"परब धाम "के संत शिरोमणि पूज्य श्री करशनदास जी और " तोरनिया धाम" के संत धर्मभूषण श्री राजेंद्रप्रसाद जी ने इस कार्य की सराहना भी की,और "विश्वास ग्रुप" इन्ही दो महान विभूति के हाथों अम्बुलंस ग्रामीण विस्तार में  कर रहा है सुप्रत |"

                     * भेसान ..जूनागढ़ के पास का एक छोटा सा गाँव |

                                 " जहाँ देश का सबसे बड़ा "महाशिवरात्रि" का मेला लगता है वो जूनागढ़ के पास में ही बसा है ये छोटा सा गाँव जहाँ पर दो अम्बुलंस दो अलग अलग गाँव को दी गई " मकर संक्रांत " के दिन याने १४-०१-२०११ के दिन शाम ४:०० बजे |"

                         * मरीज की जान कीमती या पैसा ..कुछ नेकी करो |

                    " पता नहीं मग़र उस वक़्त दिल कहे रहा था की काश ! ऐसा नेक काम हर कोई करता रहे ....क्यों की जहाँ मरीज की जान से ज्यादा अहेमियत ये पैसे नहीं रखते और यही बात "संत शिरोमणि श्री करशनदास" जी ने भी बताई थी | जो बिलकुल सही है ...मग़र शायद आज का इंसान ...मै ...आप ...हम सब यही बात को भूल रहे है क्यों की हम पैसों के पीछे दौड़ रहे है ...क्या कभी आपने आपके दोस्तों से मिलकर कभी ऐसा कोई कार्य किया है ?  क्यों की जब पैसा काम नहीं आता तब किसी की दुवा काम आती है और दुवा कभी बाज़ार में मिलाती नहीं क्यों की दुवा बिकाऊ नहीं है |"

  

3 comments:

  1. प्रेरक काम किया है। बधाई।

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  2. दुआओं में बड़ा असर होता है बंधु॥

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आओ रायता फैलाते है

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