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Wednesday, April 28, 2010

" कुत्ते की दुम सीधी होगी तभी हम सुधरेंगे ...|"

" कुत्ते की दुम अगर आप से सीधी नहीं हो पा रही, तो भला हमे कैसे सीधे करोंगे आप ? क्यों की कुत्ते में और नेता में कोई फर्क नहीं ..साले हड्डी तक नहीं छोड़ते "
" "कांग्रेस" हो या "बी .जे .पी "किसी ने इस देश को नहीं छोड़ा ..आप खुद देखिये इन तस्वीरों को ..ये आज बोलने लगी है की सच्चाई क्या है ?..कोई हिन्दू मुसलमान के नाम पर लड़वाता है तो कोई ..प्रांतवाद के नाम पर ..और हम बेवकूफ लड़ते है ..और अपने ही भाई या पडोशी का गला काटने पर दौड़ते है ..और बदले में मिलता क्या है ? ..ये ..कमरतोड़ महेंगाई , लड़ो ..लड़ो और लड़ो क्यों की ये नेता लोग जानते है की ये अब सुरविरो का देश नहीं बल्कि बुजदिलो का देश बन गया है ..यहाँ पर कोई अन्याय के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाता ..वोटिंग करते वक़्त ये बात मत सोचना सिर्फ बटन दबाना..और किसी एक पार्टी का झंडा लेकर निकल पड़ना "
" हम सब जानते है की हमने जिसको चुन कर दिया है वो ५ साल तक दिखाई नहीं देता है ,हमारे प्रश्नों का निवारण नहीं होता है ..फिर भी हम पढ़े लिखे लोग उन जनता के सेवक को कुछ पूछते ही नहीं ..आपसे अगर मैंने ५०० रूपए लिए रहेंगे तो आप मुझे वक़्त आने पर वो पैसे लौटाने को कहोगे मग़र कोई नेता आपके देश के ५०० करोड़ खा जाता है तो आप उसे पूछते ही नहीं ..इसे क्या कहोगे ?..बेवकूफी ..समजदारी ...या नादानी ?..अरे हम जैसे पढ़े लिखे लोग जब अपनी देश के प्रति जिम्मेदारी भूल रहे है तभी तो ये नेता लोग नंगा नाच ..नाच रहे है वर्ना उनकी क्या मजाल थी की हमारे देश को इस तरह लुट सके "
" आप खुद ही देखिये इन तस्वीरों को ..देखिये किसने हमे क्या दिया है ?..हमने तो सिर्फ एक वोट दिया था इन कमीनो ने बहुत कुछ दर्द नाक दिया है पहले महेंगाई बढाओ ... जैसे चुनाव नजदीक आये ..सभी अत्यावश्यक चीजो के दाम में गिरावट करके हम दर्दी जीतलो ..सत्ता आपकी होगी यही मंत्र हो गया है इन लोगो का ..क्यों की ये जानते है की भारत की जनता भोली है "
" भारत के लोग कभी अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाते ही नहीं है ..ये बात भी वो जानते है सायद इसी लिए ही कुत्ते की दुम और इन नेता में कोई फर्क नहीं क्यों की कुत्ता भी अपने मालिक के आगे पूंछ पटपटाता है जैसे हम भी तो इस भारत के मालिक है ..फर्क इतना है की कुत्ता पाने मालिक के samne पूंछ पटपटाता है और ये नेता लोग हमारे सामने ..दोनों में मालिक हम ही है "

"जियो ..जियो अपनी अपनी तरह से ..मग़र एक बात मेरी हो सके तो याद रखना, जब तक हम लोग नहीं जागेंगे अपनी नींद में से तब तक ऐसा ही होता रहेगा ..कही कोई मस्जिद टूटेगी ..तो कही कोई ...और तेलंगाना होगा ..तो कही बिजली नहीं होगी "
" यु ही लुटते रहेंगे हम अपने नेताओ से आखिर कब तक चुप रहेंगे हम ? ..घर में से एक छोटी सी चीज चुराने वाले को हम पीट सकते है मग़र हम अपने सही मायने में घर कहे जाने वाले देश को लुटनेवाले ..हमारे नेता लोगों को हम पूछ भी नहीं सकते की आप ये कर क्या रहे हो ? "
" क्या इसी को मेरा भारत महान कहते है ?क्या इस देश को, आपके घर को लुटता हुवा आप देख सकते है ?"
"अपने देश को हमारी आँखों के सामने लुटता हम देख रहे है ,तो क्या हम आवाज़ तक नहीं उठा सकते ? भाई मै बुजदिल नहीं हु ..मेरे दिल ने कहा सही है ..सो मैंने लिख दिया ..अब देख ते है इस सच्चाई को गलत कहने वाले कितने है ..ये तस्वीरें जरूर देखना ..ये बेजान तस्वीरें आज बोलने लगी है "
" आओ हम मिलकर अपने देश को बचाए ..अपने अधिकार का उपयोग करे "
ध्यान दे :
" जाग्रति अभियान" अंतर्गत ये पोस्ट देश के सही प्रेमी और पढ़े लिखे वर्ग एवं बुद्धि जीवी वर्ग को समर्पित करता हु "

Sunday, April 25, 2010

शायरी - " लैला तो मिली, मग़र मै मजनु बन न सका |"


"ये शायरी उन लोगो के नाम जो किसी के प्यार में डुबे हुवे है , ये प्यार भी अजीब है .. न जाने कितने रंग है इसके ...कभी कोई प्यार में हँसता है, तो कभी कोई रोता है ..दिल की सुननेवाले अक्सर क्यों रोते है ? "



"कहते है दर्द और जुदाई का दूसरा नाम याने "प्यार" ..."महोब्बत" है ..लाख कठनाइयां हो ने के बावजूद भी प्यार का दर्द क्यों मीठा होता है यारो ?..प्यार करनेवाला हर कोई "लैला मजनू" बन नहीं सकता ..कभी कभी ऐसा भी होता है "लैला तो बन जाती है ...मगर मजनू नहीं बन सकता "


" लैला तो मिली, मगर मै मजनु बन ना सका ,


वो मेरे प्यार में " फ़ना "हो गई ,


मगर मै ,


उसके प्यार में "मिट" भी न सका ,


लैला तो मिली ,मगर मै मजनु बन ना सका "

Friday, April 23, 2010

" दर्द और मुस्कुराहट "


"लोग कहते है ,


"दर्द" में भी तुम कैसे "मुस्कुराते" हो ?


मैंने कहा ,


ये "दर्द" से ही पुछो


"मुस्कुराना "मैंने "दर्द" से ही सिखा है

Tuesday, April 20, 2010

"ख़त ,कफ़न, कासिद ..और तेरा इंतज़ार |"





" तेरे ख़त का इंतज़ार करते करते ,



बीत गया हर लम्हा ,



तेरा "ख़त" आया , कम्बक्त "कासिद" आया ,



ये " कफ़न" जाने कहाँ से आया ,



आज भी ओढ़े सोया हु " कफ़न" ,



ख़त के इंतज़ार में |"

Sunday, April 18, 2010

"बंजर ख्वाबो की दुनिया में ,फूलों की सेज सजा रहा हु"

" बंजर ख़्वाबों की दुनिया में ,फूलों की सेज सजा रहा हु ,
जिन्दगी के आईने पर पड़ी धुल ,साफ़ करने की कोशिश कर रहा हु ,
मौत आने से पहले ए - बेवफा ,
बहते अश्क में, तुजे ढूंढने की कोशिश कर रहा हु "

Wednesday, April 14, 2010

क्या इस देश में जवानों का खून बहुत सस्ता है ?

" शायद इस देश में जवानों का खून बहुत सस्ता है ,आतंकवाद और नक्शलवाद के खिलाफ लड़ने वाले इन बहादुर जवानों के हाथों में बन्दुक तो है मगर आर्डर नहीं है |नक्शलवादी और आतंकवादियों की गोली सीने में खा कर देश के लिए जान देनेवाले " जवान " और "एस.आर.पी" के लिए सरकार के पास सिर्फ दुःख भरे अल्फाज़ है ,मगर कोई ठोश कदम नहीं है |"

" कहा जाता है की भारत याने " सोने की चिड़ियाँ "है , मगर जरा देखो इस देश को नोच नौच कर खानेवाले अपने राजनेता के पास आतंकवाद और नक्शल्वाद से निपटने के लिए शायद वक़्त नहीं है ...सिर्फ इसीलिए ही हम " हेडली ,राणा,मुंबई हमलावेर और ये नक्शलवाद का हम बाल भी बांका नहीं कर सकते है |"

" हमारे राजनेताओं को डर है ,अमरीका का | ये वही अमरीका है जिसने अमरीका से दूर इराक पर हमला बोल दिया था ...और उस हमले की वजह हम सब अच्छी तरह जानते है |अमरीका अपने देश के गुन्हेगारोँ को कभी छोडता नहीं है और भारत को शांति पूर्वक मसला हल करने को क्यों कहेता है ?एक अमेरिकेन नागरिक के हत्या के जुर्म में अमेरिका " आतंकवादियों को नहीं छोडता है और उस पर कड़ी से कड़ी सजा भरी कार्यवाही आरंम्भ करता है ....तो फिर हमारे देश में शेंकडो भारतीय नागरिकों की मौत होती है " आतंकवाद" से उसका क्या करैं ? अमरीका का एक आदमी " आतंकवाद " का भोग बनता है तो आतंकी के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करता है अमेरिका तो फिर ऐसे मक्कार अमरीका का हम क्यों सुने ? क्या अमेरिका पुरे विश्व का कोतवाल है ?"

"पोखरण परीक्षण" के बाद अमेरिका ने हम पर प्रतिबन्ध लादे थे मगर इस प्रतिबन्ध का फायदा भारत को ही हुवा था और नुकशान हुवा था अमेरिका का ...जब ये बात उन्हें पता चली तो उन्होंने भारत पर से प्रतिबन्ध उठा लिए , ये बात से एक बात साबित होती है की हमें अमेरिका की जरुरत नहीं है मगर अमेरिका को हमारी जरुरत है| जब भारतसे बात करता है अमेरिका तब," पाकिस्तान को कोई मदद नहीं करेंगे हम" ,ये बात बार बार दोहरा कर कहते है की " पाकिस्तान आतंकवाद और पाकिस्तान में चल रहे आतंकी ट्रेनिंग कैंप बंध करे इस विधान के कुछ ही दिनों के बाद अमेरिका पाकिस्तान से शस्त्रों का सौदा करता है ,ये तो अब आम बात बन गयी है और ये बात हमारे नेता लोग भी जानते है मगर डरपोक कही के ..अमेरिका के मुहँ पर ये बात नहीं कर सकते है की "आतंकवाद की वजह से हजारों की संख्या में मरने वाले लोग हमारे भारतवाशी है ..अब बहुत हो गया |"

"खैर ...बात हो रही थी आतंकी और नक्ष्लवाद की ..अभी कुछ दिन पहले जब नक्ष्लवादियों ने कुछ लोगो को मार गिराया तब ..भारत के मिनिस्टर "पी .चिदम्बरम " ने कहा था की " मै उनसे वार्तालाप करूँगा "..भैया ...आप वार्तालाप की बात करते रहो और नक्शली आपके वार्ता लाप के टेबल पर ..लाशों का ढेर लगाते रहेंगे क्यों की नक्शली लातों के भुत है बातों से नहीं मानेंगे " और भेज दिए हमारे वीर " एश आर पी " जवानों के लाशों के ढेर ..लो करो "वार्तालाप"|"

" विरोध करने के और भी तरीके है ..अगर ये बात समजाने से भी नहीं समजते है नक्शली तो महेरबानी करके नक्शली को "एल.टी. टी . " बन ने मत दो , इस देश के जवानों का खून इतना सस्ता नहीं है ये उन्हें दिखा दो |"

" और हाँ ,इस देश में फैशन है और आगे से चली आती है की " पहले मिनिस्टर बनो ...फिर सिर्फ रिश्वत खाओ .....और जब देश में कोई बड़ा हाशा बन जाये तो, उस हाशे की सारी जिम्मेदारी अपने सर पर लेकर हीरो बन जाओ , क्यों की ये नेता लोग जानते है की यहाँ पर ऐसा कानून नहीं है इस देश में की कोई उन्हें पुछ सके की ऐसी गलती हुई कैसे की हजारों की जान गयी ...या सेंकडो की जान गयी |"

" शायद इस देश में जवानों का खून बहुत ही सस्ता है..... "

Tuesday, April 13, 2010

ब्लॉगर भाईयो तु तु मै मै से हिंदी भाषा नहीं बचेगी |

" हिंदी भाषा को बचाव ,हिंदी है हम ...ये नारे देने वाले हम लोग आज अपने इगो का शिकार हो गए है,जैसे मुझे सब पता है ,मै सब जानता हु की कैसे प्रचार होगा हिंदी भाषा का ....अरे क्या खाक जानता है ? "
" मेरे ब्लॉग पर आकर ,मेरी पोस्ट पर कोई गलत टिप्पणी दे जाता है ..तो कोई मेरी सराहना भी करता है..जब सराहना करता है कोई तो अच्छा लगता है मगर जब गलत टिप्पणी देता है तब बात आती है हिंदी ब्लॉग जगत को अलविदा कहेने की ...क्या ये रास्ता सही है ? तब हम भूल जाते है की हम यहाँ अनेको वजह से आते है मगर उनमे एक वजह होती है हिंदी भाषा को बचाना और उसका प्रचार करना "
" मै ये नहीं कहेता की गलत टिप्पणी का जवाब नहीं देना चाहिए ..देना ही चाहिए जवाब ,...मगर वो जवाब हिंदी ब्लॉग जगत को "टाटा या अलविदा " कहेके नहीं बल्कि अगर आप सही है तो ईट का जवाब एक ही बार दो मगर पत्थर से दो ...और अगर आप गलत है तो दिल खोल कर माफ़ी मांग लो, क्यों की माफ़ी मांगने से इंसान छोटा नहीं बन जाता "
"एक दुसरे पर आरोप लगाने से क्या मिलेगा आपको ...सुकून या बैचेनी ?...आज ब्लॉग जगत में यही देखने मिलता है हर दिन कोई न कोई ब्लॉगर किसी अन बन के कारन ब्लॉग जगत को छोड़ के जा रहा है ..सोच लो ..अगर इसी तरह होता रहा तो क्या हम हिंदी भाषा का प्रचार कर सकेंगे ? क्या हम हिंदी भाषा को बचा सकेंगे ?"
" किसी के सामने उंगली उठाने से पहले ये सोचना चाहिए की दो उंगली सामने के तरफ है तो ३ उंगली ...उंगली उठाने वाले की तरफ होती है ये तु ..तु ..मै ..मै का फंडा अब बंध हो तो ही अच्छा है .....मेरे लिए ...आपके लिए ..हम सब ब्लॉगर भाई के लिए और खासकर मेरी प्यारी हिंदी भाषा के लिए ॥

आप सभी को नम्र निवेदन
"हो सके तो एक बार "थ्री इडीयट" देख लेना जिसमे फिल्म का नायक "रेंचो" कभी मुस्केलियोँ से भागता नहीं था , बल्कि मुस्केलियोँ का सामना करता था "

" इस पोस्ट से मै किसी का दिल दुखाना नहीं चाहता ..मगर गौर से पढोगे तो पता चलेगा की मेरे हर अल्फाज़ में हिंदी भाषा के प्रति लगाव और चाहना है "
" आओ हम मिलकर हिंदी भाषा का मान पुरे संसार में बढ़ाये "

" ये पोस्ट पर मुझे टिप्पणी नहीं चाहिए ...ये पोस्ट उन लोगो के नाम जो "हिंदी" को चाहते है , मेरे ब्लॉगर भाई बहेन के नाम , फिर भी आपको अगर कोई भी सिकायत हो तो महेरबानी करके मुझे एक इ-मेल भेजिएगा जरूर "

Sunday, April 4, 2010

"मुकेश अम्बानी और रीलायन्स फ्रेश एक दीमक..उनकी वजह से बढती है महेंगाई|"

"रिलायंस फ्रेश की बदौलत बढ़ी है देश में महंगाई आम आदमी का जीना मुहाल कर देने वाली महंगाई पर तरह-तरह के विश्लेषण किए गए हैं लेकिन किसी ने भी यह जहमत उठाने की कोशिश नहीं की है कि आखिर हमारे देश में प्रचुर उत्पादन के बावजूद एकाएक शक्कर के साथ अन्य सभी खाद्य पदार्थों की कीमतों में क्यों बढ़ोत्री हुई है ? "

"कुछ दिन पहले जब रिलायंस फ्रेश के सर्वेसर्वा मुकेश अंबानी ने यह घोषणा की कि उनकी कंपनी जल्द ही दूध का कारोबार भी शुरू करेगी | तब माथा ठनका और महंगाई बढ़ने का कारण समझ में आने लगा। मुकेश की इस घोषणा के एक-दो दिन बाद ही कृषि मंत्री की तरफ से यह बयान गया कि उत्तर भारतीय इलाकों में दूध के उत्पादन में कमी हुई है लिहाजा कभी भी दूध के दाम बढ़ सकते हैं। कृषि मंत्री का यह बयान देना था कि अचानक शक्कर लॉबी की तरह मजबूत होती जा रही दूध लॉबी ने भी दामों को बढ़ा दिया और आम आदमी मन मसोसकर रह गया। वह बेचारा कर ही क्या सकता है सिर्फ सरकार के साथ अपने भाग्य को कोसने के|"


"अभी से करीब 3 साल पहले तक मौसम की मार से या किसी प्राकृतिक आपदा की बदौलत देश में किसी एकाध कृषि उपभोक्ता वस्तु की कीमतों में बढ़ोतरी हो जाया करती थी, मसलन कभी प्याज तो कभी आलू या फिर कोई भी दाल-दलहन। ऐसा कोई उदाहरण देखने को नहीं मिलता कि मौसम अथवा प्राकृतिक आपदा के कारण सभी खाद्य पदार्थों की उपलब्धता प्रभावित हुई हो, लेकिन बीते 3 वर्षों में देश में पैदा होने वाली लगभग सभी कृषि जीन्सों की भरपूर पैदावार होने के बावजूद फसल आने के समय भी दामों में किसी प्रकार की कमी दिखाई नहीं दे रही है। यदि कभी-कभार ऐसी स्थिति बनती भी है तो कृषि मंत्री यह बयान देकर पूरी कर देते हैं कि मौसम की मार से कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ है और दामों में बढ़ोत्री होना संभव है। उनका यह बयान देना होता है कि बाजार से एकाएक उस कृषि जीन्स की मांग बढ़ जाती है और कल तक जो सर्व-सुलभ वस्तु थी, वह गायब हो जाती है। इस बात के लिए कृषि मंत्री को चुनौती दी जा सकती है कि वे बताएं कि कौन से वर्ष में कृषि आधारित सभी फसलों की कमी की वजह से हर उत्पाद के दामों में दो गुनी तक वृद्धि हुई थी। यदि वे इसका संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाते हैं तो यही माना जाना चाहिए कि उन्होंने इरादतन किसी उद्योग घराने को लाभ पहुंचाने की खातिर और देश की जनता को गुमराह करने के उद्देश्य से ऐसे बयान देकर आम आदमी को महंगाई की आग में झोंका है।"


"लोकतंत्र के चौथे महत्वपूर्ण स्तंभ कहे जाने वाले आत्ममुग्ध मीडिया के किसी भी संस्करण (प्रिंट अथवा इलेक्ट्रानिक) ने इस बात के लिए कृषि मंत्री से सवाल तक करना जरूरी समझा है कि आखिर कौन से कारण रहे हैं जिनकी बदौलत लगातार तीन साल से सरकार और खासकर कृषि मंत्री महंगाई थामने में विफल रहे हैं ? कृषि मंत्री का यह कह देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता और ही वे अपनी जिम्मेदारी से यह कहकर बच सकते हैं कि सभी फैसले कैबिनेट की सहमति से होते हैं इसलिए महंगाई के लिए अकेले उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। वैसे उनके बयान का मतलब यह भी निकलता है कि सरकार के सभी नुमाइंदों की जनता को गुमराह करने में शामिल हैं।"


"गौरतलब है कि 30 सितंबर 2006 को मुकेश अंबानी ने यह घोषणा की कि वे अपने परंपरागत उद्योग-धंधों के साथ अब देश में मौजूद विषाल खुदरा बाजार में तेल-गुड़ के साथ फल-सब्जी भी बेचना शुरू करेंगे। खुदरा बाजार पर अपनी पकड़ बनाने के लिए उन्होंने 4 साल के अंदर 25 हजार करोड़ रुपए निवेश करने की योजना बनाई थी। यदि इस निवेश को आसान शब्दों में समझाना हो तो इसका मतलब यह निकलता है कि हर भारतीय पर कम से कम 22 सौ रुपए का निवेश किया। इस योजना के मुताबिक देश के 14 प्रदेशों के खास 80 शहरों में 50 लाख उपभोक्ताओं को उचित गुणवत्ता का खाद्य सामान उपलब्ध करवाने के लिए 900 से अधिक स्टोर खोले जाने का लक्ष्य था। उनके द्वारा निर्धारित समय की सीमा पूर्ण होने में अभी तकरीबन 6 माह का समय और बचा है। लेकिन इन साढ़े तीन सालों में महंगाई ने अपना असली रूप दिखा दिया है और देश की तकरीबन 20 फीसदी आबादी को दाने-दाने के लिए सोचने पर मजबूर कर दिया है। केवल 50 लाख लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए रिलायंस फ्रेश के इस व्यापार में कूद जाने से हालात कितने भयावह अब हो गए हैं।"


"यहां यह बताना गैरजरूरी नहीं है कि वर्ष 2006-07 में मुंबई की प्रति व्यक्ति आय 65 हजार 361 रुपए थी, जो देश की औसत प्रति व्यक्ति आय 29 हजार 382 रुपए के मुकाबले दोगुनी होती है। देश में सबसे अधिक प्रति व्यक्ति आय होने के बावजूद अकेले मुंबई की दस फीसदी आबादी (करीब 10 लाख लोग) की आय 20 रुपए प्रतिदिन भी नहीं, बल्कि केवल 59175 पैसे ही है। ऐसे परिवारों के पास टीवी, फ्रिज, पंखा तो दूर की बात है घरों शौचालय, पानी की आपूर्ति का स्रोत अथवा अपना वाहन तक की कोई सुविधा नहीं है। ऐसे में देश के केवल 50 लाख लोगों को सुविधाएं देने नाम पर 25 हजार करोड़ रुपए के निवेश के जरिए आम आदमी को महंगाई की भट्टी में झोंक देने को क्या कहा जाएगा।"


"मेरे दूध लॉबी की अवधारणा से अनेक को आपत्ति हो सकती है, लेकिन जिस तरह से दूध का धंधा शहरों और कस्बों में फैला है और जिस तरह से शासन-प्रशासन उनके सामने घुटने टेकने को मजबूर रहता है, उससे इस लॉबी की विशालता पता चलता है। दोपहिया वाहन पर जिस तरह से दूध की कम से कम दो बड़ी-बड़ी टंकियां (अधिकतम की 4 से 6 तक) लादकर जिस तरह भीड़ भरे ट्राफिक में से गुजर कर इस लॉबी के कर्ता-धर्ता अपने काम को बेखौफ हो अंजाम देते हैं, उस देखकर ऐसा लगता ही नहीं कि शहर-कस्बे में यातायात पुलिस प्रशासन नाम की कोई व्यवस्था भी है। ऐसा भी नहीं है कि ये नजारे केवल छोटे-मोटे कस्बे अथवा शहर के हों, कमोबेश पूरे हिन्दुस्तान में इन नजारों को देखा और महसूस किया जा सकता है। क्या यातायात नियमों में दोपहिया वाहन पर दूध की टंकियां लादने को छूट दी गई है? मीडिया में बेकाबू होती महंगाई पर खूब लिखा जा चुका है, लेकिन खास बात यह है कि किसी ने भी इसका विश्लेषण करने की जहमत नहीं उठाई है कि आखिर ऐसा क्या हो गया जिसने अर्थशास्त्र के सिद्धांतों तक को दरकिनार कर दिया है।"


" अर्थशास्त्र के सामान्य सिद्धांत के अनुसार बाजार में मांग और धन का प्रवाह बढ़ने पर मुद्रास्फीति की दर के साथ महंगाई में भी बढ़ोत्री होती है लेकिन कुछ माह पहले (गत वर्ष जून में) तक तो मुद्रास्फीति की दर ऋणात्मक थी, बावजूद इसके बाजार में सिर्फ कृषि उत्पाद मसलन दाल, चावल, शक्कर और अनाज की कीमत में कोई कमी दिखी। दिलचस्प बात यह है कि इससे पहले मुद्रास्फीति की ऋणात्मक दर वर्ष 1978 के आसपास हुई थी और उस समय शक्कर सहित अन्य सभी कृषि आधारित वस्तुओं की कीमतें बेहद कम हो गई थी। आपातकाल के दौरान भी शक्कर की कीमत काफी बढ़ी हुई थी और राशन दुकानों पर कम कीमत पर शक्कर उपलब्ध कराई जाती थी। उस समय (वर्ष 1978) ऋणात्मक मुद्रास्फीति ने शक्कर की कीमतों को राशन दुकान पर उपलब्ध कीमत से भी कम पर ला दिया था लेकिन इस बार की ऋणात्मक मुद्रास्फीति ने ऐसा कोई कारनामा अंजाम नहीं दिया उल्टे सभी वस्तुओं के दाम स्थिर ही बने रहे मतलब यह कि मतलब यह कि जिस तेजी से कृषि उत्पादों की कीमतें बढ़ रही थी, केवल उनका बढ़ना भर रुका था। इसका कारण साफ था कि यह सब जमाखोरी के चलते संभव हो पाया था और आज भी सरकार इस पर अंकुश लगा पाने में पूरी तरह नाकामयाब ही दिखती है|"


" वह केवल लोगों को यह बयान देकर अपने कर्तव्य को पूरा करने में लगी है कि सरकार द्वारा महंगाई को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जा रहे हैं जल्द ही लोगों को महंगाई से निजात मिलेगी लेकिन ठोस उपाय करने के नाम पर मौद्रिक नीति में थोड़ा उलटफेर कर दिया जाता है।महंगाई के मुद्दे पर सभी दलों की खामोशी ने यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि शासन करने की मौजूदा नीति केवल उद्योगपतियों के साथ नेताओं और अफसरों के लिए ही फायदेमंद साबित हो रही है, आम आदमी तो बस जल्द ही अपने गरीबी की रेखा में आने का इंतजार कर रहा है और तैसे-तैसे अपने दिन गुजारने को मजबूर है. मौजूदा महंगाई में सामान्य आदमी अपना गुजारा कैसे चला पा रहा है, यह उससे बेहतर और कोई नहीं जान सकता है और शासन-प्रशासन ने जनता को तो भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है |"




इस बहेतरीन पोस्ट के असली हकदार है मेरे अज़ीज़ ,मेरे अपने श्री कुलदीप जी ...जिन्होंने काफी महेनत से ये पोस्ट बनाया है, जिसे मै आप लोगो के सामने रख रहा हु |और धन्यवाद् कहेता हु श्री कुलदीप जी को एक जागरूकता भरी पोस्ट के लिए ....श्री कुलदीप जी से किये वादे के मुजब, मुझसे थोड़ी देरी होगई इस चिट्ठे को आप तक पहुचने में इस लिए मै श्री कुलदीप जी से माफ़ी मांगता हु ... बहुत कुछ कहे जाती है ये पोस्ट अगर गौर से पढ़े तो ..किस तरह से ये उद्योगपति हमें दीमक की तरह खोकला करके अपनी तिजोरी भर रहे है ...ये आपके सामने है .............|"




----- धन्यवाद् गूगल { चित्रों के लिए }