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Friday, October 23, 2009

" दो पल "---- एक रचना

" दो पल "

" चिंता मत कर प्यारे कल की,


सोच बस्स ! आज के इस पल की,


होती है हार एक दिन सबकी,


कोई नही इतनी पक्की |



युग युग का है तू युगंधर ,


जिन्दगी है दुःख का समंदर ,


जीना तु ये सोचकर ,


बिताना जिन्दगी तु खेलकर |



करता है बदनाम दूसरों को जमाना ,


तु है एक मुसाफिर बेगाना ,


मत खोलना फ़िर कोई मयखाना ,


बस्स ! सोच के ये तराना |



वक्त नही तेरे पास कल ,


यही है बस्स ! दुःख के पल ,


िताना तु उसको कहके चल ,


फ़िर " तुलसी " तेरे है "दो पल " | "









Wednesday, October 14, 2009

"गाँधीजी" या "नोबेल पुरस्कार" कौन है बड़ा ?---आज फ़ैसला करो

" गाँधीजी का नाम लेकर काम करनेवालों को मिलता है "नोबेल पुरस्कार" ,मगर " गाँधी "को नही ?


दोस्तों आओ जाने विस्तार से : " गांधीजी बार नोमिनेट हुवे थे, " नोबेल पुरस्कार " के लिए १९३७ , १९३८ , १९३९ .ये थे वो वर्ष जिसमे गांधीजी भी थे दावेदार नोबेल पुरस्कार के मगर १९३७ और १९३८ में कुछ हुवा नही और १९३९ और १९४७ में उनका नाम "शोर्टलिस्ट" हुवा |१९३७ और १९३८ में उनका नाम क्यु निकला गया ,कैसे निकला गया ये पता नही |"





" आख़िरकार १९४८ के वर्ष में गांधीजी के नाम पर नोबेल पुरस्कार की मुहर लगी ..ये खबर मिलने के कुछ महीनो बाद ही गांधीजी की हत्या हो गई थी उनकी हत्या होते ही खड़ा हुवा एक ऐसा विवाद की "किसी को भी मरणोत्तर पुरस्कार नही दिया जाता ये नोबेल कमिटी का नियम है |"इस विवाद पर परदा डालते हुवे नोबेल पुरस्कार कमिटी के सलाहकार "श्री सेएयपे "ने कहा की " गाँधी के जीवन के अन्तिम महीनो की जानकारी से हमे ,ये पता चलता है की गांधीजी ने सिर्फ़ और सिर्फ़ भारत के लोगो के लिए ही काम किया है और जो भी संदेश उन्होंने दिए है वो सभी संदेश से ये प्रतीत होता है की गांधीजी की तुलना "धर्मस्थापक व्यक्ति" के साथ करनी चाहिए ..नही की " शान्ति दूत "के रूप से |"




"दोस्तों ,जब गांधीजी जिन्दा थे तब इन नोबेल पुरस्कार की कमिटी को ये पता नही चला और जब विवाद बढ़ गया तो अचानक गांधीजी शान्ति दूत मिटकर धर्मस्थापक व्यक्ति बन गए ? ये कहाँ का न्याय है ?"




"बात यहाँ से ख़त्म नही होती है , गाँधीजी के विरोधी याने " मुलेर " जिन्होंने कहा की " गाँधी सदा के लिए अपने मूल मंत्र " se दृढ नही थे कई बार उनकी अंग्रजों के खिलाफ की अहिन्सा की लडाई हिंसा में परिवर्तित हो जाती थी |और गांधीजी सिर्फ़ भारत के लोगो के लिए ही कार्यरत थे विश्व समुदाय के लिए नही |"




" क्या मुलेर का कहेना ठीक है ? क्या सच मुच गांधीजी ने विश्व समुदाय के लिए कुछ नही किया था ?...अब इस मुलेर को कौन समजाये की " बेटे सायद तुने गांधीजी को ठीक से जाना नही है ...|"


" बराक ओबामा , नेल्सन मंडेला जैसे महानुभाव हमारे गांधीजी को आदर्श मानकर उनके बताये रस्ते पर चलकर "नोबेल पुरस्कार" ले जाते है मगर ...हाय रे किस्मत हमारी ...हमारे " राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी "नोबेल पुरस्कार वालो की नजर में "नोबेल पुरस्कार" के लिए लायक नही थे|"




" मगर इन सब बातों से एक बात साबित होती है की " सायद नोबेल पुरस्कार झूठा है ...या फ़िर नोब्रेल पुरस्कार कमिटी झूठी है ...क्यु की हमारे "राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी "और उनके आदर्श कभी झूठे नही हो सकते |"


" यहाँ तक दोस्तों की १९४७ के नोबेल पुरस्कार के चेयरमेन श्री गुन्नार ने अपनी डायरी में लिखा है की " ये सच है की महात्मा गाँधी सब उम्मेद्वारो में से श्रेष्ठ है , महान है |"



" अरे ये नोबेल कमिटी क्या जाने की हमारे गाँधी के आगे धन्यवाद संदेश बहुत ही छोटा है ..क्यु की लोगो के दिल में से आज भी गाँधी के लिए " महात्मा " अल्फाज़ निकलता है ,और आप लोगो को पुरस्कार देते वक्त ये कहेना पड़ता है की फलाना व्यक्ति " नोबेल पुरस्कार "विजेता है ....तो बड़ा कौन हुवा ...आपका नोबेल पुरस्कार या लोगो के दिल ने दिया " महात्मा " ये सन्मान |"



----dhnyawad " sandesh "

Wednesday, October 7, 2009

" पती देवो सावधान " : मुंबई हाई कोर्ट का फैसला

" बीवी को बिना बताये देर से घर लौटना गुनाह है |"


" लेट लतीफों ..सावधान रहेना ...और सुधर जाओ ...हर रोज़ देर से घर मत आओ |"


" मुंबई हाई कोर्ट ने कहा की " बीवी " को बिना बताये हर रोज़ देर रात घर लौटना मतलब बीवी परआप जुल्म कर रहे हो | हाई कोर्ट की डिविजन बैंच ने कहा की जिन्दगी में ऐसी घटना याने अपनी बीवी पर आप जुल्म कर रहे है ...कम से कम आप अपनी बीवी को फ़ोन करके उसे अपनी देर से आने की वजह बता दे ,ताकि बीवी घर पर बैठी व्यर्थ चिंता ना करे ....| "


" आपकी बीवी आपकी चिंता में आधी रात तक इंतज़ार करती रहे और आप ...बादशाह की तरह देर रात घर लौटे ये तो सरासर अन्याय ही है .....उसको भी हक है ..आप से ये पूछने का की आप क्या कर रहे थे इतनी रात ? ऐसा कौनसा काम पड़ा था ? ...."


" कोर्ट ने ये भी कहा की " मिया बीवी एक दुसरे के व्यव्हार प्रति प्रश्न कर सकते है और अगर वक्त ही ऐसा हो तो बीवी अपने पती पर भी शंका कर सकती है |"


" चलो ये भी अच्छा हुवा " औरत को कही कही एक नया, कानून का आदेश तो मिला |अब नही करेंगी वो जुल्म का सामना ....आप बच सकते है ..सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी बीवी को अपने देर से घर आने की सच्ची वजह बता कर ..आज कल मोबाइल फ़ोन की तो सुविधा है ...फ़िर क्यों नही करते है आप फ़ोन ? "


"दोस्तों, औरत ...अपने सुख और दुःख का साथी है ...और ये भी सही है की बिना वजह हम अपनी बीवी को क्यों परेशां करे ...जो भी बात हो उसके पास बैठकर ..उसके साथ बांटो ..... परिवार के सुख के लिए कामना करनेवाली बीवी से हम इतना तो कहे सकते है की ...आज ..मुझे घर आने में देरी होगी |"


" धन्यवाद मुंबई हाई कोर्ट "